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डागळे ललकार, रसोई में महकार

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
बीकानेर । छतों पर गूंजते गीत और पतंग कटते ही बोयकाट्या की आवाज से बढ़ता उत्साह। भोर की पहली किरण से शुरू हुआ यह माहौल अंधेरा छाने तक अनवरत चलता रहा। इस दौरान कहीं से आवाज आती गवरा दादी पून दे, टाबरियो रा चंदा उड़े... तो दूसरी तरफ से आवाज सुनाई देती उड़े उड़े चंदा आकाशा में...ऐसे माहौल ने नगर स्थापना दिवस के उत्साह को दुगुना कर दिया। गुरुवार को शहर के 525वें स्थापना दिवस पर सुबह और शाम के समय अधिकांश लोग छतों पर पहुंच गए और पतंगबाजी की। अलसुबह ही पतंगबाजी की तैयारियां शुरू हो गई। बच्चों और युवाओं ने पतंगों में काणिये पोए। भोर की पहली किरण के साथ ही छतों पर बोयकाट्या का शोर शुरू हो गया। दिन चढऩे के साथ साथ युवाओं का जोश बढ़ता गया। यह जोश आकाश में नजर आने लगा। छतों पर चढ़े युवाओं और बच्चों को न तो चिलचिलाती धूप रोक पाई और न हवा की बेरुखी। दोपहर बाद इन युवाओं की उम्मीदों को पंख लग गए जब हवा उनके रुख की हो गई। उसके साथ परकोटे के भीतरी शहर में तो मानो आकाश में पतंगों का छाता नजर आने लगा हो।पेंच लड़ाने वालों का उत्साह उनके साथ ही छतों पर चढ़े लोग बढ़ा रहे थे। नगर स्थापना दिवस पर उत्साह और उल्लास के साथ साथ लोगों ने परंपराओं का भी निर्वहन किया। घरों में बाजरी, मंूग का खीचड़ा तैयार किया गया तो घर घर में नई मटकी छानी। सागर गांव में कल्ला कोठी से चंदा उड़ाया गया। इससे पूर्व चंदा को खीचड़े और ईमलाणी का भोग लगाया गया।
 कटी पतंगे लूटने के लिए प्रेरित करते लोग 
तों से कुछ यूं चिल्लाते आंखल ले..आंखल ले..। पतंग के रंग, साइज और डिजाइन से मिलने वाले इन संबोधनों में पांखल, डांडल, भूतण, परियल, पटील, मकड़ी, टीकल, चांदल, तिग्गी, छग्गी, अधी, पूणी, टकलड़ी, मेणकी, छरी आदि बीसियों नामों का उपयोग होता रहा।