श्राद्ध कैसे करें ? जानिए श्राद्ध पक्ष का महत्व

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श्रीनारायण आचार्य
बीकानेर। श्राद्ध पक्ष शुरू होनें के साथ ही शहर के अलग-अलग सरोवरों में विद्वान पण्डितों द्वारा तर्पण कर्म प्रारम्भ हो चुका है। अलसुबह धरणीधर तालाब व हर्षोलाव तालाब में दिवंगत हुए पितरों की शान्ति के लिए उनके पुत्रों व पौत्रों द्वारा पानी में तिल, जौ व कुश द्वारा तर्पण किया गया। श्राद्धपक्ष में लगातार 15 दिन यहां तर्पण कर्म जारी रहेगा। मान्यता है कि पितृपक्ष के इन दिनों में पितर पृथ्वी पर आते है। पितरों को खुश रखने, घर परिवार में सुख शान्ति के लिए नियमित तर्पण कर्म करना चाहिए। धरणीधर तालाब में पण्डित नवरतन व्यास व पं.गोपाल ओझा द्वारा विधिविधान से तर्पण करवाया गया। इस दौरान पं.नवरतन व्यास ने बताया कि प्रत्येक मनुष्य की इच्छा रहती है कि वह एवं उसका परिवार सुखी एवं सम्पन्न रहें। मनुष्य की इस इच्छा को पूरा करने के लिए देवता के साथ-साथ अपने पितरों का भी पूजन आवश्यक होता है। जिन लोगों को अपने पितरों के नाम मालूम ना हो वो तो वे रूद्र विष्णु एवं ब्रह्मा और गंगा, यमुना व सरस्वती के नाम का उच्चारण करते है। भगवान सूर्य को जल चढ़ाकर तिलांजली दी जाती है।

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पितृ पक्ष का महत्‍व 
हिन्‍दू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्‍व है. हिन्‍दू धर्म को मानने वाले लोगों में मृत्‍यु के बाद मृत व्‍यक्ति का श्राद्ध करना बेहद जरूरी होता है. मान्‍यता है कि अगर श्राद्ध न किया जाए तो मरने वाले व्‍यक्ति की आत्‍मा को मुक्ति नहीं मिलती है. वहीं कहा जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान पितरों का श्राद्ध करने से वे प्रसन्‍न होते हैं और उनकी आत्‍मा को शांति मिलती है. मान्‍यता है कि पितृ पक्ष में यमराज पितरों को अपने परिजनों से मिलने के लिए मुक्‍त कर देते हैं. इस दौरान अगर पितरों का श्राद्ध न किया जाए तो उनकी आत्‍मा दुखी हो जाती है.

श्राद्ध में लोहे या स्टील के पात्रों का उपयोग ना करें :-
शास्त्रानुसार श्राद्ध कर्म में लोहे या स्टील के पात्रों का प्रयोग वर्जित है। श्राद्ध कर्म में चांदी के पात्रों को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। चांदी के अभाव में तांबे के पात्रों का प्रयोग कर सकते हैं।
श्राद्ध पक्ष में नित्य मार्कण्डेय पुराणांतर्गत ‘पितृ स्तुति’ करने से पितृ प्रसन्न एवं तृप्त होकर अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
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श्राद्ध कैसे करें?
 श्राद्ध करने के लिए आप किसी विद्वान पुरोहित को बुला सकते हैं.
 श्राद्ध के दिन अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार अच्‍छा खाना बनाएं.
 खासतौर से आप जिस व्‍यक्ति का श्राद्ध कर रहे हैं उसकी पसंद के मुताबिक खाना बनाएं.
 खाने में लहसुन-प्‍याज का इस्‍तेमाल न करें.
 मान्‍यता है कि श्राद्ध के दिन स्‍मरण करने से पितर घर आते हैं और भोजन पाकर तृप्‍त हो जाते हैं.
 इस दौरान पंचबलि भी दी जाती है.
 शास्‍त्रों में पांच तरह की बलि बताई गई हैं: गौ (गाय) बलि, श्वान (कुत्ता) बलि, काक (कौवा) बलि, देवादि बलि, पिपीलिका (चींटी) बलि.
 यहां पर बलि का मतलब किसी पशु या जीव की हत्‍या से नहीं बल्‍कि श्राद्ध के दौरान इन सभी को खाना खिलाया जाता है.
 तर्पण और पिंड दान करने के बाद पुरोहित या ब्राह्मण को भोजन कराएं और दक्षिणा दें.
 ब्राह्मण को सीधा या सीदा भी दिया जाता है. सीधा में चावल, दाल, चीनी, नमक, मसाले, कच्‍ची सब्जियां, तेल और मौसमी फल शामिल हैं.
 ब्राह्मण भोज के बाद पितरों को धन्‍यवाद दें और जाने-अनजाने हुई भूल के लिए माफी मांगे.
 इसके बाद अपने पूरे परिवार के साथ बैठकर भोजन करें.
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