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कार्तिक मास : जानें इस महीने की महिमा, कार्तिक स्नान की कहानी

कार्तिक मास में भगवान विष्णु धरती पर जल में वास करते हैं। इसलिए इस महीने में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने का विशेष महत्व है। 29 अक्टूबर से कार्तिक मास का आरंभ हो गया है। कार्तिक मास में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको इस कथा का रोजाना पाठ करना चाहिए।

इस महीने में मां लक्ष्मी धरती पर भ्रमण करती हैं और भक्तों को अपार धन देती हैं. इस महीने में धन और धर्म दोनों से संबंधित कई प्रयोग और नियम हैं. कार्तिक मास में विशेष रूप से श्रीहरि की उपासना की जाती है. कार्तिक मास में तुलसी का रोपण और विवाह सर्वोत्तम होता है. इस महीने दान करने से अक्षय शुभ फल की प्राप्ति होती है. विशेष तौर पर दीप दान करने से बड़ा लाभ मिलता है. इस बार कार्तिक का महीना 29 अक्टूबर यानी आज से शुरू हो रहा है, जो 27 नवंबर 2022 तक रहेगा.

कार्तिक मास का महत्व

हिंदू धर्म में कार्तिक मास का बहुत विश्ष महत्व है. इस मास में श्री विष्णु जी के साथ तुलसी की भी पूजा अर्चना की जाती है. इस मास में स्नान, दान, दीप करने से कष्टों से छुटकारा मिलता है. पूरे कार्तिक के महीने में सुबह जल्दी उठकर स्नान करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है.

कार्तिक माह में धर्मराज जी की कहानी

किसी गाँव में एक बुढ़िया रहती थी, वह बहुत नियम धर्म से व्रत रखा करती थी. एक दिन भगवान के घर से यमदूत उसे लेने आ गए और वह उनके साथ चल पड़ी. चलते-चलते एक गहरी नदी आई तो यमदूत बोले कि माई! तुमने गोदान की हुई है या नही? बुढ़िया ने उनकी बात सुनकर मन में श्रद्धा से गाय का ध्यान किया तो वह उनके समक्ष आ गई और बुढ़िया उस गाय की पूँछ पकड़कर नदी पार कर गई. वह यमदूतों के साथ फिर आगे बढ़ी तो काले कुत्ते आ गए. यमदूत फिर बोले कुत्तों को खाना दिया था? बुढ़िया ने मन में कुत्तों का ध्यान किया तो वे रास्ते से चले गए. अब बुढ़िया फिर से आगे बढ़ने लगी तो रास्ते में कौए ने उसके सिर में चोंच मारनी शुरु कर दी तो यमदूत बोले कि ब्राह्मण की बेटी के सिर में तेल लगाया था? बुढ़िया ने ब्राह्मण की बेटी का ध्यान किया तो कौए ने चोंच मारनी बंद कर दी. कुछ आगे बढ़ने पर बुढ़िया के पैर में काँटे चुभने लगे तो यमदूत बोले कि खड़ाऊ आदि दान की है? बुढ़िया ने उनका ध्यान किया तो खड़ाऊ उसके पैरों में आ गई. बुढ़िया फिर आगे बढ़ी तो चित्रगुप्त जी ने यमराज से कहा कि आप किसे लेकर आए हो? यमराज जी बोले कि बुढ़िया ने दान-पुण्य तो बहुत किए हैं लेकिन धर्मराज जी का कुछ नहीं किया इसलिए आगे द्वार इसके लिए बंद हैं. सारी बात सुनने के बाद बुढ़िया बोली कि आप मुझे सिर्फ सात दिन के लिए वापिस धरती पर भेज दो. मैं धर्मराज जी का व्रत और उद्यापन कर के वापिस आ जाऊँगी. बुढ़िया माई वापिस धरती पर अपने गाँव आ गई और गाँव वालों ने उसे भूतनी समझकर अपने दरवाजे बंद कर दिए. वह जब अपने घर गई तो उसके बहू-बेटे भी दरवाजे बंद कर के बैठ गये. बुढ़िया ने कहा कि मैं भूतनी नहीं हूँ, मैं तो धर्मराज जी की आज्ञा से वापिस धरती पर सात दिन के लिए आई हूँ. इन सातों दिनों में मैं धर्मराज जी का व्रत और उद्यापन करुँगी जिससे मुझे परलोक में जगह मिलेगी. बुढ़िया की बातों से आश्वस्त होकर बहू-बेटे उसके लिए पूजा की सारी सामग्री एकत्रित करते हैं लेकिन जब बुढ़िया कहानी कहती है तब वह हुंकारा नहीं भरते जिससे बुढ़िया फिर अपनी पड़ोसन को कहानी सुनाती है और वह हुंकारा भरती है. सात दिन की पूजा, व्रत व उद्यापन के बाद धर्मराज जी बुढ़िया को लेने के लिए विमान भेजते हैं. स्वर्ग का विमान देख उसके बहू-बेटों के साथ सारे गाँववाले भी स्वर्ग जाने को तैयार हो गए. बुढ़िया ने कहा कि तुम कहाँ तैयार हो रहे हो? मेरी कहानी तो केवल पड़ोसन ने सुनी है इसलिए वही साथ जाएगी. सारे गाँववाले बुढ़िया से धर्मराजी की कहानी सुनाने का आग्रह करते हैं तब बुढ़िया उन्हें कहानी सुना देती है. कहानी सुनने के बाद सारे ग्रामवासी विमान में बैठकर स्वर्ग जाते हैं तो धर्मराज जी कहते हैं मैने तो विमान केवल बुढ़िया को लाने भेजा था. बुढ़िया माई कहती है कि हे धर्मराज ! मैने जो भी पुण्य किए हैं उसमें से आधा भाग आप गाँववालों को दे दो. इस तरह से धर्मराज ने ग्रामवासियों को भी स्वर्ग में जगह दे दी. हे धर्मराज महाराज! जैसे आपने बुढ़िया के साथ सभी गाँववालों को भी स्वर्ग में जगह दी उसी तरह से हमें भी देना. कहानी सुनकर हुंकारा भरने वालों को भी और कहानी कहने वाले को भी जगह देना. धर्मराज महाराज जी की जय! यमराज महाराज जी की जय!

कार्तिक स्नान की कहानी (इल्ली और घुण)
एक इल्ली और घुण था | इल्ली बोली आओ घुण कार्तिक स्नान करे घुण बोला तू ही कार्तिक स्नान कर ले | मैं तो नही करूंगा | बाद में इल्ली तो राजा की लडकी के पल्ले के लगकर कार्तिक स्नान करती | घुण ने कार्तिक स्नान नहीं किया | दोनों मर गये | बाद में इल्ली के कार्तिक स्नान के पुण्य कें कारण राजा के घर जन्म हुआ और घुण राजा के घर गधा बन गया |
राजा ने बेटी के विवाह का सावा निकाला | बेटी ससुराल जाने लगी तो उसने अपनी पालकी रुकवाई और राजा से कहा यह गधा मुझे चाहिए |तब राजा ने कहा यह मत ले चाहे और धन दोलत ले ले पर लडकी नही मानी | मुझे तो यही चाहिए | गधे को रथ के बांध दिया तो गधा दोड़ने लगा | महल में पहुचने पर गधे को महल के नीचे बांध दिया | जब लडकी नीचे उतरती तो तो गधा कहता मुझे पानी पिलादे तब लडकी ने कहा मेने पहले ही कहा था कार्तिक स्नान कर ले पर तूने कहा था मैं तो बाजरा खौऊगा और ठंडा – ठंठा पानी पीऊगा | उनको बाते करते राजा ने सुन लिया , जब राजा ने कहा कि आप मुझे सारी बात बताओ तब रानी { लडकी } ने राजा को सारी बात बताई कि में पिछले जन्म में इल्ली थी और ये घुण था | तब मेने कहा तू भी कार्तिक नहा ले पर वह नहीं नहाया |
मैं कार्तिक स्नान के पुण्य से राजा के घर लडकी हुई और आपके घर में राज पाठ कर रही हु | तब राजा ने कहा कि कार्तिक स्नान का इतना पुण्य है तो हम दोनों जोड़े से न्हायेगे | रानी – राजा ने अत्यंत प्रसन्न मन से कार्तिक स्नान कर दोनों ने दान – पुण्य किया और सारी नगरी में कहलवा दिया की सब कार्तिक स्नान कर नहाया हुआ पानी घुण पे डालेगे जिससे घुण की मोक्ष हुई | हे ! कार्तिक भगवान [विष्णु भगवान ] जैसा सुख़ इल्ली को दिया वैसा सबको देना |

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