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जानिए वर्ष 2019 में गुरुपूर्णिमा का महत्व, उपाय आदि…

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आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। हिंदू धर्म में इस पूर्णिमा का विशेष महत्व है। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात दो अक्षरों से मिलकर बने ‘गुरु’ शब्द का अर्थ – प्रथम अक्षर ‘गु का अर्थ- ‘अंधकार’ होता है जबकि दूसरे अक्षर ‘रु’ का अर्थ- ‘उसको हटाने वाला’ होता है।
अर्थात् अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु वह है जो अज्ञान का निराकरण करता है अथवा गुरु वह है जो धर्म का मार्ग दिखाता है। श्री सद्गुरु आत्म-ज्योति पर पड़े हुए विधान को हटा देता है।
‘सदगुरु जिसे मिल जाय सो ही धन्य है जन मन्य है।
सुरसिद्ध उसको पूजते ता सम न कोऊ अन्य है॥
अधिकारी हो गुरुदेव से उपदेश जो नर पाय है।
भोला तरे संसार से नहीं गर्भ में फिर आय है॥’
धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के अवतार वेद व्यासजी का जन्म हुआ था। इन्होंने महाभारत आदि कई महान ग्रंथों की रचना की। कौरव, पाण्डव आदि सभी इन्हें गुरु मानते थे इसलिए आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा व व्यास पूर्णिमा कहा जाता है। गुरु का दर्जा भगवान के बराबर माना जाता है क्योंकि गुरु, व्यक्ति और सर्वशक्तिमान के बीच एक कड़ी का काम करता है. संस्कृत के शब्द गु का अर्थ है अन्धकार, रु का अर्थ है उस अंधकार को मिटाने वाला.
आत्मबल को जगाने का काम गुरु ही करता है. गुरु अपने आत्मबल द्वारा शिष्य में ऐसी प्रेरणाएं भरता है, जिससे कि वह अच्छे मार्ग पर चल सके. साधना मार्ग के अवरोधों एवं विघ्नों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान है. गुरु शिष्य को अंत: शक्ति से ही परिचित नहीं कराता, बल्कि उसे जागृत एवं विकसित करने के हर संभव उपाय भी बताता है.
इस वर्ष गुरु पूर्णिमा का पवन पर्व एवं व्रत 16 जुलाई,2019 (मंगलवार) को मनाया जायेगा ।
इस दिन गुरु की पूजा कर सम्मान करने की परंपरा प्रचलित है। हिंदू धर्म में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि गुरु ही अपने शिष्यों को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है तथा जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार करता है इसलिए यह कहा गया है-
गुरुब्र्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।
अर्थात- गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं।
भारत में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है. प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा हमारे भीतर गुरू के महत्व को परिलक्षित करती है. पहले विद्यार्थी आश्रम में निवास करके गुरू से शिक्षा ग्रहण करते थे तथा गुरू के समक्ष अपना समस्त बलिदान करने की भावना भी रखते थे, तभी तो एकलव्य जैसे शिष्य का उदाहरण गुरू के प्रति आदर भाव एवं अगाध श्रद्धा का प्रतीक बना जिसने गुरू को अपना अंगुठा देने में क्षण भर की भी देर नहीं की.
व्यास पूर्णिमा महर्षि व्यास की अद्भुत शक्ति, कृपा और मानवीय प्रज्ञा की स्मृति में मनाई जाती है। हिंदू धर्म में महर्षि व्यास को आदि गुरु माना गया है।प्राचीन काल में गुरु के आश्रम में जब विद्यार्थी निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन गुरु का पूजन करके उन्हें दान-दक्षिणा देकर उन्हें पाद पूजन करता था।
गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह उच्चवल और प्रकाशमान होते हैं उनके तेज के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते. गुरू पूर्णिमा का स्वरुप बनकर आषाढ़ रुपी शिष्य के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है. शिष्य अंधेरे रुपी बादलों से घिरा होता है जिसमें पूर्णिमा रूपी गुरू प्रकाश का विस्तार करता है. जिस प्रकार आषाढ़ का मौसम बादलों से घिरा होता है उसमें गुरु अपने ज्ञान रुपी पुंज की चमक से सार्थकता से पूर्ण ज्ञान का का आगमन होता है.
 गोवर्धन पर्वत की इस दिन लाखों श्रद्धालु परिक्रमा देते हैं । बंगाली साधु सिर मुंडाकर परिक्रमा करते हैं क्योंकि आज के दिन सनातन गोस्वामी का तिरोभाव हुआ था । ब्रज में इसे ‘मुड़िया पूनों’ कहा जाता है । आज का दिन गुरु–पूजा का दिन होता है । इस दिन गुरु की पूजा की जाती है। पूरे भारत में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। वैसे तो व्यास नाम के कई विद्वान हुए हैं परंतु व्यास ऋषि जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, आज के दिन उनकी पूजा की जाती है। हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यास जी ही थे। अत: वे हमारे आदिगुरु हुए। उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए हमें अपने-अपने गुरुओं को व्यास जी का अंश मानकर उनकी पूजा करनी चाहिए। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण करते थे तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु की पूजा किया करते थे और उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा अर्पण किया करते थे। इस दिन केवल गुरु की ही नहीं अपितु कुटुम्ब में अपने से जो बड़ा है अर्थात माता-पिता, भाई-बहन आदि को भी गुरुतुल्य समझना चाहिए।
इस दिन (गुरु पूजा) प्रात:काल स्नान पूजा आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर उत्तम और शुद्ध वस्त्र धारण कर गुरु के पास जाना चाहिए। उन्हें ऊंचे सुसज्जित आसन पर बैठाकर पुष्पमाला पहनानी चाहिए। इसके बाद वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर तथा धन भेंट करना चाहिए। इस प्रकार श्रद्धापूर्वक पूजन करने से गुरु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। गुरु के आशीर्वाद से ही विद्यार्थी को विद्या आती है। उसके हृदय का अज्ञानता का अन्धकार दूर होता है। गुरु का आशीर्वाद ही प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी, ज्ञानवर्धक और मंगल करने वाला होता है। संसार की संपूर्ण विद्याएं गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती हैं और गुरु के आशीर्वाद से ही दी हुई विद्या सिद्ध और सफल होती है। इस पर्व को श्रद्धापूर्वक मनाना चाहिए, अंधविश्वासों के आधार पर नहीं।
गुरु पूर्णिमा अर्थात सद्गुरु के पूजन का पर्व। गुरु की पूजा, गुरु का आदर किसी व्यक्ति की पूजा नहीं है अपितु गुरु के देह के अंदर जो विदेही आत्मा है, परब्रह्म परमात्मा है उसका आदर है, ज्ञान का आदर है, ज्ञान का पूजन है, ब्रह्मज्ञान का पूजन है।गुरू पूर्णिमा अर्थात गुरू के ज्ञान एवं उनके स्नेह का स्वरुप है. हिंदु परंपरा में गुरू को ईश्वर से भी आगे का स्थान प्राप्त है तभी तो कहा गया है कि हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर. इस दिन के शुभ अवसर पर गुरु पूजा का विधान है. गुरु के सानिध्य में पहुंचकर साधक को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त होती है.
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी होता है. वेद व्यास जी प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वेदों की भी रचना की थी इस कारण उन्हें वेद व्यास के नाम से पुकारा जाने लगा.
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जानिए गुरु पूर्णिमा महत्व—
गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर, गुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:
अर्थात- गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है. गुरु ही साक्षात परब्रह्म है. ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं.
उक्त वाक्य उस गुरु की महिमा का बखान करते हैं जो हमारे जीवन को सही राह पर ले जाते हैं. गुरु के बिना यह जीवन बहुत अधूरा है. यूं तो हम इस समाज का हिस्सा हैं ही लेकिन हमें इस समाज के लायक बनाता है गुरु. शिक्षक दिवस के रूप में हम अपने शिक्षक को तो एक दिन देते हैं लेकिन गुरु जो ना सिर्फ शिक्षक होता है बल्कि हमें जीवन के हर मोड़ पर राह दिखाने वाला शख्स होता है उसको समर्पित है यह गुरु पूर्णिमा का दिन..
गुरु के प्रति नतमस्तक होकर कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है गुरुपूर्णिमा. गुरु के लिए पूर्णिमा से बढ़कर और कोई तिथि नहीं हो सकती. जो स्वयं में पूर्ण है, वही तो पूर्णत्व की प्राप्ति दूसरों को करा सकता है. पूर्णिमा के चंद्रमा की भांति जिसके जीवन में केवल प्रकाश है, वही तो अपने शिष्यों के अंत:करण में ज्ञान रूपी चंद्र की किरणें बिखेर सकता है. इस दिन हमें अपने गुरुजनों के चरणों में अपनी समस्त श्रद्धा अर्पित कर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए. यह पूर्णिमा व्यास पूर्णिमा भी कहलाती है. गुरु कृपा असंभव को संभव बनाती है. गुरु कृपा शिष्य के हृदय में अगाध ज्ञान का संचार करती है.
गुरु को ब्रह्मा कहा गया है. गुरु अपने शिष्य को नया जन्म देता है. गुरु ही साक्षात महादेव है, क्योकि वह अपने शिष्यों के सभी दोषों को माफ करता है. गुरु का महत्व सभी दृष्टि से सार्थक है. आध्यात्मिक शांति, धार्मिक ज्ञान और सांसारिक निर्वाह सभी के लिए गुरू का दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है. गुरु केवल एक शिक्षक ही नहीं है, अपितु वह व्यक्ति को जीवन के हर संकट से बाहर निकलने का मार्ग बताने वाला मार्गदर्शक भी है.
गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है.
वास्तव में हम जिस भी व्यक्ति से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु हो जाता है और हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा ‘गुरु पूर्णिमा’ अथवा ‘व्यास पूर्णिमा’ है. लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं उन्हें माल्यापर्ण करते हैं तथा फल, वस्त्र  इत्यादि वस्तुएं गुरु को अर्पित करते हैं. यह गुरु पूजन का दिन होता है जो पौराणिक काल से चला आ रहा है.
हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु से मंत्र लेकर वेदों का पठन करने वाला शिष्य ही साधना की योग्यता पाता है। व्यावहारिक जीवन में भी देखने को मिलता है कि बिना गुरु के मार्गदर्शन या सहायता के किसी कार्य या परीक्षा में सफलता कठिन हो जाती है। लेकिन गुरु मिलते ही लक्ष्य आसान हो जाता है। गुरु ऐसी युक्ति बता देते हैं, जिससे सभी काम आसान हो जाते हैं। गुरु का मार्गदर्शन किसी ताले की चाभी की तरह है। इस प्रकार गुरु शक्ति का ही रूप है। वह किसी भी व्यक्ति के लिए एक अवधारणा और राह बन जाते हैं, जिस पर चलकर व्यक्ति मनोवांछित परिणाम पा लेता है। पुराणों में एक प्रसंग मिलता है कि जिसके अनुसार संतों, ऋषियों और देवताओं ने महर्षि व्यास से अनुरोध किया था कि जिस तरह सभी देवी-देवताओं की पूजा के लिए कोई न कोई दिन निर्धारित है उसी तरह गुरुओं और महापुरुषों की अर्चना के लिए भी एक दिन निश्चित होना चाहिए। इससे सभी शिष्य और साधक अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता दर्शा सकेंगे। इस अनुरोध पर वेद व्यास ने आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन से ‘ब्रह्मासूत्र’ की रचना शुरू की और तभी से इस दिन को व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा। गुरु वह है, जिसमें आकर्षण हो, जिसके आभा मंडल में हम स्वयं को खिंचते हुए महसूस करते हैं। जितना ज्यादा हम गुरु की ओर आकर्षित होते हैं, उतनी ही ज्यादा स्वाधीनता हमें मिलती जाती है। कबीर, नानक, बुद्ध का स्मरण ऐसी ही विचित्र अनुभूति का अहसास दिलाता है। गुरु के प्रति समर्पण भाव का मतलब दासता से नहीं, बल्कि इससे मुक्ति का भाव जागृत होता है। गुरु के मध्यस्थ बनते ही हम आत्मज्ञान पाने लायक बनते हैं। सच्चा गुरु स्वयं को कभी थोपता नहीं है। वह अपने व्यवहार हमारे सामने ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करता है जिससे हम वैसा व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं। गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान देने के साथ-साथ जीवन में अनुशासन में जीने की कला भी सिखाते हैं। वह व्यक्ति में सत्कर्म और सद्विचार भर देते हैं। इसलिए गुरु पूणिर्मा को अनुशासन पर्व के रूप में भी मनाया जाता है।
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी गुरुपूर्णिमा का विशेष महत्व है।
जिन लोगों की कुंडली में गुरुप्रतिकूल स्थान पर होता है, उनके जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते है। वे लोग यदि गुरु पूर्णिमा के दिन नीचे लिखे उपाय करें तो उन्हें इससे काफी लाभ होता है।
यह उपाय इस प्रकार हैं-
(१)- भोजन में केसर का प्रयोग करें और स्नान के बाद नाभि तथा मस्तक पर केसर का तिलक लगाएं।
(२)- साधु, ब्राह्मण एवं पीपल के वृक्ष की पूजा करें।
(३)- गुरु पूर्णिमा के दिन स्नान के जल में नागरमोथा नामक वनस्पति डालकर स्नान करें।
(४)- पीले रंग के फूलों के पौधे अपने घर में लगाएं और पीला रंग उपहार में दें।
(५)- केले के दो पौधे विष्णु भगवान के मंदिर में लगाएं।
(६)- गुरु पूर्णिमा के दिन साबूत मूंग मंदिर में दान करें और 12 वर्ष से छोटी कन्याओं के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लें।
(७)- शुभ मुहूर्त में चांदी का बर्तन अपने घर की भूमि में दबाएं और साधु संतों का अपमान नहीं करें।
(८)- जिस पलंग पर आप सोते हैं, उसके चारों कोनों में सोने की कील अथवा सोने का तार लगाएं ।
इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 16 जुलाई 2019 (मंगलवार) को मनाई जाएगी–
प्रिय दर्शकों/पाठकों, आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। हिंदू धर्म में इस पूर्णिमा का विशेष महत्व है। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात दो अक्षरों से मिलकर बने ‘गुरु’ शब्द का अर्थ – प्रथम अक्षर ‘गु का अर्थ- ‘अंधकार’ होता है जबकि दूसरे अक्षर ‘रु’ का अर्थ- ‘उसको हटाने वाला’ होता है। आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाई जाती हैं। इस बार ये 16 जुलाई 2019 (मंगलवार) को मनाई जा रही है । गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ होती है। इस ऋतु के बाद चार महीने तक पूजा यानी शिक्षा-ग्रहण का विधान है। इस दिन चारों वेदों के व महाभारत के रचियता, संस्कृत के परम विद्वान कृष्ण द्वैपायन व्यास जी का जन्मदिन भी मनाया जाता है। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है।
 “अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया,चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नमः “
गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।
पूरे भारत में यह त्‍योहार बेहद धूमधाम से मनाया जाता है. कहा जाता है कि प्राचीन काल में इसी दिन शिष्‍य अपने गुरुओं की पूजा करते थे. भारतीय परम्परा में गुरु को भगवान से भी ऊंचा माना गया है, इसलिए यह दिन गुरु की पूजा का विशेष दिन है। ऐसा माना जाता है कि गुरु पूर्णिमा को गुरु की पूजा करने से ज्ञान और शांति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
अर्थात् अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु वह है जो अज्ञान का निराकरण करता है अथवा गुरु वह है जो धर्म का मार्ग दिखाता है। श्री सद्गुरु आत्म-ज्योति पर पड़े हुए विधान को हटा देता है।
‘सदगुरु जिसे मिल जाय सो ही धन्य है जन मन्य है।
सुरसिद्ध उसको पूजते ता सम न कोऊ अन्य है॥
अधिकारी हो गुरुदेव से उपदेश जो नर पाय है।
भोला तरे संसार से नहीं गर्भ में फिर आय है॥’
पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कीइस दिन भगवान विष्णु के अवतार वेद व्यासजी का जन्म हुआ था। इन्होंने महाभारत आदि कई महान ग्रंथों की रचना की। कौरव, पाण्डव आदि सभी इन्हें गुरु मानते थे इसलिए आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा व व्यास पूर्णिमा कहा जाता है। गुरु का दर्जा भगवान के बराबर माना जाता है क्योंकि गुरु, व्यक्ति और सर्वशक्तिमान के बीच एक कड़ी का काम करता है. संस्कृत के शब्द गु का अर्थ है अन्धकार, रु का अर्थ है उस अंधकार को मिटाने वाला |जिस प्रकार चंद्रमा पूर्णिमा की रात सर्वकलाओं से परिपूर्ण हो जाता है और वह अपनी शीतल रश्मियां समभाव से सभी को वितरित करता है। उसी प्रकार सम्पूर्ण ज्ञान से ओत-प्रोत गुरु अपने सभी शिष्यों को अपने ज्ञान प्रकाश से आप्लावित करता है। पूर्णिमा गुरु है। आषाढ़ शिष्य है। बादलों का घनघोर अंधकार। आषाढ़ का मौसम जन्म-जन्मान्तर के लिये कर्मों की परत दर परत। इसमें गुरु चांद की तरह चमकता है और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।
तमसो मा ज्योर्तिगमय
मृत्र्योमा अमृतं गमय
चांद जब पूरा हो जाता है तो उसमें शीतलता आ जाती है। इस शीतलता के कारण ही चांद को गुरु के लिये चुना गया होगा। चांद में मां जैसी शीतलता एवं वात्सल्य है। इसलिये हमारे ऋषियों व महापुरुषों ने चांद की शीतलता को ध्यान में रखकर आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु को समर्पित किया है। अत: शिष्य, गृहस्थ, संन्यासी सभी गुरु पूर्णिमा को गुरु पूजन कर आशीर्वाद ग्रहण करते हैं। गुरु महिमा को इस स्तुति से वंदित किया गया है-
गुर्रुब्रह्मï गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:
गुरु: साक्षात् परमब्रह्मï तस्मै श्री गुरवे नम:।।
गुरु पूर्णिमा को गुरु का ध्यान करते हुए गुरु की पूजा, अर्चना व अभ्यर्थना करनी चाहिए। भक्ति और निष्ठा के साथ उनके रचे ग्रंथों का पाठ करते हुए उनकी पावन वाणी का रसास्वादन करना चाहिए। उनके उपदेशों पर आचरण करने की निष्ठा का वर मांगना चाहिए। अत: इस गुरु पूर्णिमा से हमें कुछ विशेष करने का संकल्प लेना चाहिए। तभी हमारे सद्गुरु हमारे जीवन में अवतरित होंगे और जीवन धन्य बन सकेगा।
आत्मबल को जगाने का काम गुरु ही करता है. गुरु अपने आत्मबल द्वारा शिष्य में ऐसी प्रेरणाएं भरता है, जिससे कि वह अच्छे मार्ग पर चल सके. साधना मार्ग के अवरोधों एवं विघ्नों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान है. गुरु शिष्य को अंत: शक्ति से ही परिचित नहीं कराता, बल्कि उसे जागृत एवं विकसित करने के हर संभव उपाय भी बताता है |
इस वर्ष गुरु पूर्णिमा का पवन पर्व एवं व्रत 16 जुलाई 2019 (मंगलवार) को मनाया जायेगा ।
इस दिन गुरु की पूजा कर सम्मान करने की परंपरा प्रचलित है। हिंदू धर्म में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि गुरु ही अपने शिष्यों को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है तथा जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार करता है इसलिए यह कहा गया है-
गुरुब्र्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।
अर्थात- गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं।
भारत में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है. प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा हमारे भीतर गुरू के महत्व को परिलक्षित करती है. पहले विद्यार्थी आश्रम में निवास करके गुरू से शिक्षा ग्रहण करते थे तथा गुरू के समक्ष अपना समस्त बलिदान करने की भावना भी रखते थे, तभी तो एकलव्य जैसे शिष्य का उदाहरण गुरू के प्रति आदर भाव एवं अगाध श्रद्धा का प्रतीक बना जिसने गुरू को अपना अंगुठा देने में क्षण भर की भी देर नहीं की |
व्यास पूर्णिमा महर्षि व्यास की अद्भुत शक्ति, कृपा और मानवीय प्रज्ञा की स्मृति में मनाई जाती है। हिंदू धर्म में महर्षि व्यास को आदि गुरु माना गया है।प्राचीन काल में गुरु के आश्रम में जब विद्यार्थी निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन गुरु का पूजन करके उन्हें दान-दक्षिणा देकर उन्हें पाद पूजन करता था।
पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह उच्चवल और प्रकाशमान होते हैं उनके तेज के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते. गुरू पूर्णिमा का स्वरुप बनकर आषाढ़ रुपी शिष्य के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है. शिष्य अंधेरे रुपी बादलों से घिरा होता है जिसमें पूर्णिमा रूपी गुरू प्रकाश का विस्तार करता है. जिस प्रकार आषाढ़ का मौसम बादलों से घिरा होता है उसमें गुरु अपने ज्ञान रुपी पुंज की चमक से सार्थकता से पूर्ण ज्ञान का का आगमन होता है | गुरु वह है जो आसक्ति को हमारे भीतर से निकाल कर शिष्य को भक्ति का मन्त्र देते है। इस भक्ति से शिष्य संतुष्टि की संपत्ति प्राप्त करता है, जिससे जीवन में अनेक समस्याओ का वह सामना करता है। गुरु कहते है समस्त जगत को गुरु स्वरूप देखो। गुरु वह है जो हमारे ज्ञान का विस्तार करते है। प्रकृति में प्रत्येक तत्व ऐसा है, जो हमें कुछ न कुछ गुण देता है। जब हम इस प्रकृति को समझते है, इसके गुण तत्व को समझते है तो हम सद्गुणी हो जाते है। भगवान दत्तात्रय ने स्वयं अपने जीवन में 24 गुरु बनाये और मानव जाती को यह बताया कि प्रत्येक पदार्थ में विशेष गुण होता है। उस गुण को हमें आत्मसात करना चाहिए। जब समस्त जगत को गुरु स्वरुप देखोगे तो प्रत्येक वस्तु का आदर करोगे। गुरु पूर्णिमा इसी संकल्प को स्मरण करने का दिवस है, जिससे अनंत सवेंदनाओ का विस्तार होता है और सत्कार्य मूर्तरूप लेकर हमारे सामने होते है। हम ग्रहणशीलता के मूर्तरूप बने। अपनी क्षुद्र अहम भावना से रिक्त रहे, तब प्रकृति की समस्त निधियां हमारे भीतर समाती है और शिष्य अपने श्वासों में उस शुद्धता को अनुभव करता है, जो पर्वत से गुजरने वाली हवाओं की तरह शुद्ध और सात्विक है। यही अनुभव ही गुरु पूर्णिमा है। जीवन में सच्चे गुरु का पदार्पण बहुत बड़े सौभाग्य का प्रतीक है। लेकिन हम गुरु के स्थूल शरीर तक ही अटके रहे, तो उद्देश्य पूरा होने वाला नहीं। गुरु मात्र इशारा करता है, चलना शिष्य को खुद ही होता है। गुरु दिशा देता है, बढ़ना शिष्य को स्वयं ही होता है। विवेक और अंतर्वाणी के रूप में जब गुरु की वाणी शिष्य के अंतःकरण में पहुंचने लगे तो समझो कि गुरु, सदगुरु बनकर शिष्य के जीवन में प्रकट हो चले हैं। इसे गुरुपूर्णिमा का चरमोत्कर्ष कहें तो अतिश्योक्ति न होगी।
गोवर्धन पर्वत की इस दिन लाखों श्रद्धालु परिक्रमा देते हैं । बंगाली साधु सिर मुंडाकर परिक्रमा करते हैं क्योंकि आज के दिन सनातन गोस्वामी का तिरोभाव हुआ था । ब्रज में इसे ‘मुड़िया पूनों’ कहा जाता है । आज का दिन गुरु–पूजा का दिन होता है । इस दिन गुरु की पूजा की जाती है। पूरे भारत में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। वैसे तो व्यास नाम के कई विद्वान हुए हैं परंतु व्यास ऋषि जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, आज के दिन उनकी पूजा की जाती है। हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यास जी ही थे। अत: वे हमारे आदिगुरु हुए। उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए हमें अपने-अपने गुरुओं को व्यास जी का अंश मानकर उनकी पूजा करनी चाहिए। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण करते थे तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु की पूजा किया करते थे और उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा अर्पण किया करते थे। इस दिन केवल गुरु की ही नहीं अपितु कुटुम्ब में अपने से जो बड़ा है अर्थात माता-पिता, भाई-बहन आदि को भी गुरुतुल्य समझना चाहिए।
इस दिन (गुरु पूजा) प्रात:काल स्नान पूजा आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर उत्तम और शुद्ध वस्त्र धारण कर गुरु के पास जाना चाहिए। उन्हें ऊंचे सुसज्जित आसन पर बैठाकर पुष्पमाला पहनानी चाहिए। इसके बाद वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर तथा धन भेंट करना चाहिए। इस प्रकार श्रद्धापूर्वक पूजन करने से गुरु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। गुरु के आशीर्वाद से ही विद्यार्थी को विद्या आती है। उसके हृदय का अज्ञानता का अन्धकार दूर होता है। गुरु का आशीर्वाद ही प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी, ज्ञानवर्धक और मंगल करने वाला होता है। संसार की संपूर्ण विद्याएं गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती हैं और गुरु के आशीर्वाद से ही दी हुई विद्या सिद्ध और सफल होती है। इस पर्व को श्रद्धापूर्वक मनाना चाहिए, अंधविश्वासों के आधार पर नहीं। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का होता है। मन्दिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं।
पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की गुरु पूर्णिमा अर्थात सद्गुरु के पूजन का पर्व। गुरु की पूजा, गुरु का आदर किसी व्यक्ति की पूजा नहीं है अपितु गुरु के देह के अंदर जो विदेही आत्मा है, परब्रह्म परमात्मा है उसका आदर है, ज्ञान का आदर है, ज्ञान का पूजन है, ब्रह्मज्ञान का पूजन है।गुरू पूर्णिमा अर्थात गुरू के ज्ञान एवं उनके स्नेह का स्वरुप है. हिंदु परंपरा में गुरू को ईश्वर से भी आगे का स्थान प्राप्त है तभी तो कहा गया है कि हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर. इस दिन के शुभ अवसर पर गुरु पूजा का विधान है. गुरु के सानिध्य में पहुंचकर साधक को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त होती है |
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी होता है. वेद व्यास जी प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वेदों की भी रचना की थी इस कारण उन्हें वेद व्यास के नाम से पुकारा जाने लगा |
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वेद व्‍यास का होता है जन्‍मदिन–
यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।श्री वेदव्यासजी ने चारों वेदों का संपादन कर अनेक पुराणों की रचना की। पुराणों के माध्यम से उन्होंने मानव जाती को कल्याण का मार्ग दिखाया। भारतीय संदर्भ में व्यास को गुरु का प्रतीक-प्रतिनिधि मानने की परंपरा रही है। वेद से लेकर महाभारत, गीता एवं पुराणों की रचना करने वाले महर्षि व्यास को ऐसे पूर्ण व्यक्तित्व का प्रतीक मानकर गुरु तत्व की पूजा का विधान है। जिसका कोई गुरु न हो, वहां शिव को भी आदिगुरु के रूप में वरण एवं पूजा का विधान है। बाकि हर युग में ऐसे प्रकाशपूर्ण व्यक्ति हुए हैं, जो गुरु की भूमिका में शिष्यों का मार्गदर्शन करते रहे हैं।
पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की महर्षि व्यास का चरित्र इतना शुभ्र और लोकोत्तर है, जीवन उन्नत और लोकसंग्रहार्थ है, कि वह गुरु शिरोमणि माने गये । उनकी जन्मतिथी ‘गुरुपूर्णिमा’ कहलायी ताकि सभी गुरुओं के वह अादर्श बनें । उन्हों ने रचा हुअा बहुमुखी वाङमय (पुराणों से लेकर ब्रह्मसू्त्र तक) सदीयों से हर प्रकार के मानव को मार्गदर्शन और चेतना प्रदान करता रहा है । यही वजह है कि उन्हें “भगवान” की संज्ञा देते हुए कहा गया;
अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विबाहुरपरो हरिः ।
अभाललोचनः शम्भुर्भगवान् बादरायणः ॥
उनके चार मुख नहीं, फिर भी जो ब्रह्मा है; दो बाहु है, फिर भी हरि (विष्णु) है; मस्तिष्क पर तीसरा नेत्र नहीं, फिर भी शम्भु है; ऐसे भगवान श्री बादरायण (बद्री वृक्ष के तले जन्मे हुए याने व्यास मुनि) है ।
जीवन में सुयोग्य गुरु मिला हो या न हो, गुरुपूर्णिमा के दिन महर्षि वेद व्यास का स्मरण कर उन्हें कृतज्ञ बुद्धि से नमस्कार करना चाहिए ।
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क्यों है गुरू पूर्णिमा का इतना महत्व :-
ग्रंथों के अनुसार आषाढ़ मास की पूर्णिमा को सबसे बड़ी पूर्णिमा माना जाता है। यह पूर्णिमा ग्रह-नक्षत्रों के हिसाब से भी विशेष होती है, आषाढ़ की पूर्णिमा को अवंतिका में ‘अष्ट महाभैरव पूजन’ परंपरा से जोड़ा जाता है, शास्त्रों में इस दिन गुरुओं के चरण पूजन का भी विधान बताया गया है। इसी कारण इस दिन गुरू की पूजा कर उनके चरणों की वंदना की जाती है।
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जानिए गुरु पूर्णिमा महत्व—
गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर, गुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:
अर्थात- गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है. गुरु ही साक्षात परब्रह्म है. ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं.
उक्त वाक्य उस गुरु की महिमा का बखान करते हैं जो हमारे जीवन को सही राह पर ले जाते हैं. गुरु के बिना यह जीवन बहुत अधूरा है. यूं तो हम इस समाज का हिस्सा हैं ही लेकिन हमें इस समाज के लायक बनाता है गुरु. शिक्षक दिवस के रूप में हम अपने शिक्षक को तो एक दिन देते हैं लेकिन गुरु जो ना सिर्फ शिक्षक होता है बल्कि हमें जीवन के हर मोड़ पर राह दिखाने वाला शख्स होता है उसको समर्पित है यह गुरु पूर्णिमा का दिन..
पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की गुरु के प्रति नतमस्तक होकर कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है गुरुपूर्णिमा. गुरु के लिए पूर्णिमा से बढ़कर और कोई तिथि नहीं हो सकती. जो स्वयं में पूर्ण है, वही तो पूर्णत्व की प्राप्ति दूसरों को करा सकता है. पूर्णिमा के चंद्रमा की भांति जिसके जीवन में केवल प्रकाश है, वही तो अपने शिष्यों के अंत:करण में ज्ञान रूपी चंद्र की किरणें बिखेर सकता है. इस दिन हमें अपने गुरुजनों के चरणों में अपनी समस्त श्रद्धा अर्पित कर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए. यह पूर्णिमा व्यास पूर्णिमा भी कहलाती है. गुरु कृपा असंभव को संभव बनाती है. गुरु कृपा शिष्य के हृदय में अगाध ज्ञान का संचार करती है.
गुरु को ब्रह्मा कहा गया है. गुरु अपने शिष्य को नया जन्म देता है. गुरु ही साक्षात महादेव है, क्योकि वह अपने शिष्यों के सभी दोषों को माफ करता है. गुरु का महत्व सभी दृष्टि से सार्थक है. आध्यात्मिक शांति, धार्मिक ज्ञान और सांसारिक निर्वाह सभी के लिए गुरू का दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है. गुरु केवल एक शिक्षक ही नहीं है, अपितु वह व्यक्ति को जीवन के हर संकट से बाहर निकलने का मार्ग बताने वाला मार्गदर्शक भी है.
गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है.
वास्तव में हम जिस भी व्यक्ति से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु हो जाता है और हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा ‘गुरु पूर्णिमा’ अथवा ‘व्यास पूर्णिमा’ है. लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं उन्हें माल्यापर्ण करते हैं तथा फल, वस्त्र  इत्यादि वस्तुएं गुरु को अर्पित करते हैं. यह गुरु पूजन का दिन होता है जो पौराणिक काल से चला आ रहा है.
पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु से मंत्र लेकर वेदों का पठन करने वाला शिष्य ही साधना की योग्यता पाता है। व्यावहारिक जीवन में भी देखने को मिलता है कि बिना गुरु के मार्गदर्शन या सहायता के किसी कार्य या परीक्षा में सफलता कठिन हो जाती है। लेकिन गुरु मिलते ही लक्ष्य आसान हो जाता है। गुरु ऐसी युक्ति बता देते हैं, जिससे सभी काम आसान हो जाते हैं। गुरु का मार्गदर्शन किसी ताले की चाभी की तरह है। इस प्रकार गुरु शक्ति का ही रूप है। वह किसी भी व्यक्ति के लिए एक अवधारणा और राह बन जाते हैं, जिस पर चलकर व्यक्ति मनोवांछित परिणाम पा लेता है। पुराणों में एक प्रसंग मिलता है कि जिसके अनुसार संतों, ऋषियों और देवताओं ने महर्षि व्यास से अनुरोध किया था कि जिस तरह सभी देवी-देवताओं की पूजा के लिए कोई न कोई दिन निर्धारित है उसी तरह गुरुओं और महापुरुषों की अर्चना के लिए भी एक दिन निश्चित होना चाहिए। इससे सभी शिष्य और साधक अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता दर्शा सकेंगे। इस अनुरोध पर वेद व्यास ने आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन से ‘ब्रह्मासूत्र’ की रचना शुरू की और तभी से इस दिन को व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा। गुरु वह है, जिसमें आकर्षण हो, जिसके आभा मंडल में हम स्वयं को खिंचते हुए महसूस करते हैं। जितना ज्यादा हम गुरु की ओर आकर्षित होते हैं, उतनी ही ज्यादा स्वाधीनता हमें मिलती जाती है। कबीर, नानक, बुद्ध का स्मरण ऐसी ही विचित्र अनुभूति का अहसास दिलाता है। गुरु के प्रति समर्पण भाव का मतलब दासता से नहीं, बल्कि इससे मुक्ति का भाव जागृत होता है। गुरु के मध्यस्थ बनते ही हम आत्मज्ञान पाने लायक बनते हैं। सच्चा गुरु स्वयं को कभी थोपता नहीं है। वह अपने व्यवहार हमारे सामने ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करता है जिससे हम वैसा व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं। गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान देने के साथ-साथ जीवन में अनुशासन में जीने की कला भी सिखाते हैं। वह व्यक्ति में सत्कर्म और सद्विचार भर देते हैं। इसलिए गुरु पूणिर्मा को अनुशासन पर्व के रूप में भी मनाया जाता है।
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी गुरुपूर्णिमा का विशेष महत्व है।
सूर्य आत्मा का कारण है और चन्द्रमा मन का कारण है। सूर्य तेज है तो चन्द्रमा शीतलता है। भगवान शिव जी ने भी द्वितीया का चन्द्रमा मस्तक पर धारण किया है। हलाहल पान की गर्मी को शांत करता चन्द्रमा उनके मस्तक पर सदैव विराजमान रहता है। सूर्य पिता है तो चन्द्रमा माता है। चन्द्रमा शब्द को कैसे भी कहें चाहे चन्द्र अ मा, पूर्णि अ मा, अमा अ वस्या।
सबमें ‘मां’ शब्द है। मां सब माफ करती है जैसे महागुरु, परमगुरु, सद्गुरु सब माफ करता है, सब भूलों को क्षमा करता है क्योंकि वह जानता है कि गुण गुण में वर्तने के कारण सब दोष स्वाभाविक हैं इसलिए दूसरों को क्या दोष देना?
चन्द्रमा जब सूर्य के सामने 180 डिग्री पर आता है तो पूर्णिमा होती है। सूर्य के प्रकाश की गर्मी चन्द्रमा पर से परावर्तित होती है, तो उसमें शीतलता होती है और आषाढ़ मास वर्षा ऋतु का भी मास है लेकिन सूर्य की तपिश के साथ-साथ इसी मास में सूर्य आद्र्रा नामक नक्षत्र में प्रवेश करता है और यह आद्र्रा प्रवेश की कुण्डली ही वर्षा के ज्योतिषीय आयामों पर प्रकाश डालती है कि इस वर्ष वर्षा ऋतु कैसी रहेगी कहां-कहां वर्षा का प्रभाव रहेगा। कहां दुर्भिक्ष पड़ेगा।
पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को चन्द्रमा देव गुरु बृहस्पति की धनु राशि में होता है और शुक्राचार्य के नक्षत्र पू. आषाढ़ में होता है अर्थात् मन दोनों ही गुरुओं से संबंध कर पूर्ण ज्ञान का अभिलाषी बन जाता है। चन्द्रमा की रोशनी ही वनस्पतियों में रस उत्पन्न करती है। इसी चन्द्रमा से मानव में ज्ञान रस की वृद्धि होती है और यह मन ही है जो मनुष्य को ज्ञान-विज्ञान दोनों में प्रवीण कर सकता है। मन की शांति व समय के लिये चन्द्रमा की उपासना करना जरूरी है। मन शान्त हो, तो ही जीवन यात्रा सफल होती है।
आषाढ़ मास में वर्षा ऋतु के बादल कभी चांद की ओर हों, तो उसकी रोशनी भी ढक सकते हैं और जब अंधकार हो जायेगा तब गुरु पूर्णिमा का प्रकाश बेहद शीतलता देगा। उसी प्रकार सच्चे शिष्य कितने भी अंधकार में हों, गुरुदेव उन्हें ढूंढ ही लेते हैं। चन्द्रमा केवल निमित्त मात्र है। वह केवल दर्पण है जो आत्मसाक्षात्कार कराता है।
चूंकि सूर्य आत्मा है इसलिये सीधे आत्मा का साक्षात्कार संभव नहीं होता। अर्जुन जैसा महान योद्धा भी श्री कृष्ण के विराट रूप को देखकर बोल उठा था- प्रभु, आपका तेज सहस्त्र सूर्यों के समान है। मैं इसे सह नहीं पा रहा हूं, कृपया अपने सौम्य चतुर्भुज रूप में आयें।
अध्यात्म में सूर्य रूपी ज्ञान के प्रकाश से सीधा साक्षात्कार न करके गुरु रूपी चन्द्रमा के माध्यम से लाभ उठाने का नियम है। सूर्य परम तेजस्वी है और चन्द्रमा परम शीतल। चन्द्रमा माध्यम है सूर्य की रोशनी का। उसी प्रकार गुरु भी माध्यम है परमात्मा के उस दिव्य विराट तेज का।
प्रेम/भक्ति योग में भी प्रभु से मिलन की अपेक्षा गुरु का सान्निध्य शिष्यत्व के सहज ही प्रभु के दर्शनों में सहायक है, मुक्ति दाता है।
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ज्योतिष और गुरु पूर्णिमा का सम्बन्ध–
पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की जिन लोगों की कुंडली में गुरु प्रतिकूल स्थान पर होता है, उनके जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते है। वे लोग यदि गुरु पूर्णिमा के दिन नीचे लिखे उपाय करें तो उन्हें इससे काफी लाभ होता है। गुरु पूर्णिमा के दिन आप भगवान विष्णु को नमन करें। जो छात्र पढ़ाई में पीछे रह जा रहे है वे गीता का पाठ कर सकते है। वहीं जिनका कारोबार धीमा चल रहा है वे लोग पीले अनाज,वस्त्र आदि दान कर सकते है।
यह उपाय इस प्रकार हैं-
भोजन में केसर का प्रयोग करें और स्नान के बाद नाभि तथा मस्तक पर केसर का तिलक लगाएं।
साधु, ब्राह्मण एवं पीपल के वृक्ष की पूजा करें।
गुरु पूर्णिमा के दिन स्नान के जल में नागरमोथा नामक वनस्पति डालकर स्नान करें।
पीले रंग के फूलों के पौधे अपने घर में लगाएं और पीला रंग उपहार में दें।
केले के दो पौधे विष्णु भगवान के मंदिर में लगाएं।
गुरु पूर्णिमा के दिन साबूत मूंग मंदिर में दान करें और 12 वर्ष से छोटी कन्याओं के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लें।
शुभ मुहूर्त में चांदी का बर्तन अपने घर की भूमि में दबाएं और साधु संतों का अपमान नहीं करें।
जिस पलंग पर आप सोते हैं, उसके चारों कोनों में सोने की कील अथवा सोने का तार लगाएं ।
यदि कारोबार मंदा चल रहा है या किसी कारण से भाग्‍योदय नहीं हो पा रहा है। तो पूर्णिमा के दिन किसी जरूरतमंद को पीले वस्‍त्र, पीली मिठाई अथवा पीले अनाज का दान करें। तुरंत लाभ मिलेगा।
जिन बच्‍चों की पढ़ाई में बाधा आ रही है। या पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगता, उन्‍हें इस दिन भगवान कृष्‍ण की पूजा करनी चाहिए। साथ ही गाय की सेवा करने से लाभ मिलता है।
गुरु पूर्णिमा के दिन बृहस्‍पति के महामंत्र ‘ऊं बृं बृहस्‍पतये नम:’ का जाप करें। आप चाहें तो गायत्री मंत्र का जप भी कर सकते हैं। इससे भी गुरु के अशुभ प्रभाव में कमी आती है और शीघ्र फल मिलता है।
हम चाहे बात कितनी भी बड़ी बड़ी कर ले,लेकिन सच्चाई तो हम सभी जानते हैं, हमारा जीवन-मार्ग का रास्ता स्वयं ही सदगुरुदेव बनाते जाते हैं | वे पहले भी अंगुली पकडे थे अब भी हैं और कल भी रहेंगे, अंतर केवल इतना है क़ि जिसकी देखने की आँखे हैं वो देख लेता है और जिनकी नहीं हैं वे अब भी कुतर्कों के भंवर में उलझे हुए हैं……
हे गुरुदेव ! गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर आपके श्रीचरणों में अनंत कोटि प्रणाम ||
आप जिस पद में विश्रांति पा रहे हैं, हम भी उसी पद में विशांति पाने के काबिल हो जायें,अब आत्मा-परमात्मा से जुदाई की घड़ियाँ ज्यादा न रहें और ईश्वर करे कि ईश्वर में हमारी भक्ति समाहित हो जाये ||
हे गुरुदेव !आपके साथ मेरी श्रद्धा की डोर कभी टूटने न पाये ||
प्रभु करे कि प्रभु के नाते आपके साथ हमारा हमेशा गुरु-शिष्य का सम्बंध बना रहे ||
‘जय हिंद,जय हिंदी’जय भारत..जय भारती..
सम्पूर्ण भारत में गुरु पूर्णिमा पर्व आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को श्रद्धाभाव व उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। यह पर्व जीवन में गुरु की महत्ता व महर्षि वेद व्यास को समर्पित है। भारतवर्ष में कई विद्वान गुरु हुए हैं, किन्तु महर्षि वेद व्यास प्रथम विद्वान थे, जिन्होंने सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) के चारों वेदों की व्याख्या की थी। सिख धर्म में भी गुरु को भगवान माना जाता इस कारण गुरु पूर्णिमा सिख धर्म का भी अहम त्यौहार बन चुका है।
“”ॐ जय जय मम् परमगुरुदेवम् चरण कमलेभ्यो शत कोटि नमनम् वन्दनम् । जय गुरुदेवम् ।””
गुरु के प्रति नतमस्तक होकर कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है गुरुपूर्णिमा| गुरु के लिए पूर्णिमा से बढ़कर और कोई तिथि नहीं हो सकती. जो स्वयं में पूर्ण है, वही तो पूर्णत्व की प्राप्ति दूसरों को करा सकता है. पूर्णिमा के चंद्रमा की भांति जिसके जीवन में केवल प्रकाश है, वही तो अपने शिष्यों के अंत:करण में ज्ञान रूपी चंद्र की किरणें बिखेर सकता है || इस दिन हमें अपने गुरुजनों के चरणों में अपनी समस्त श्रद्धा अर्पित कर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए| यह पूर्णिमा व्यास पूर्णिमा भी कहलाती है || गुरु कृपा असंभव को संभव बनाती है. गुरु कृपा शिष्य के हृदय में अगाध ज्ञान का संचार करती है || हमारे अध्यात्म दर्शन में गुरु का बहुत महत्व है-इतना कि श्रीमद् भागवत् गीता में गुरुजनों की सेवा को धर्म का एक भाग माना गया है। शायद यही कारण है कि भारतीय जनमानस में गुरु भक्ति का भाव की इतने गहरे में पैठ है कि हर कोई अपने गुरु को भगवान के तुल्य मानता है। यह अलग बात है कि अनेक महान संत गुरु की पहचान बताकर चेताते हैं कि ढोंगियों और लालचियों को स्वीकार न करें तथा किसी को गुरु बनाने से पहले उसकी पहचान कर लेना चाहिए।
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है और इसी के संदर्भ में यह समय अधिक प्रभावी भी लगता है | इस वर्ष गुरू पूर्णिमा 16 जुलाई 2019 (मंगलवार) को मनाई जाएगी | गुरू पूर्णिमा अर्थात गुरू के ज्ञान एवं उनके स्नेह का स्वरुप है. हिंदु परंपरा में गुरू को ईश्वर से भी आगे का स्थान प्राप्त है तभी तो कहा गया है कि “हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर” ||
इस दिन के शुभ अवसर पर गुरु पूजा का विधान है | गुरु के सानिध्य में पहुंचकर साधक को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त होती है|
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी होता है| वेद व्यास जी प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वेदों की भी रचना की थी इस कारण उन्हें वेद व्यास के नाम से पुकारा जाने लगा |हिन्दु और बौद्ध धर्म में गुरु पुर्णिमा को बहुत अधिक महत्व दिया गया है।
इस वर्ष 16-07-2019 (मंगलवार)को गुरु पुर्णिमा के तौर पर मनाया जाएगा। गुरु को ईश्वर के बाद उच्च स्थान दिया गया है।
इसलिए शास्त्रो में कहा गया है कि–
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरु साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
इस मंत्र का मतलब है कि, हे गुरुदेव आप ब्रह्मा हैं, आप विष्णु हैं, आप ही शिव हैं। गुरु आप परमब्रह्म हो, हे गुरुदेव मैं आपको नमन करता हूँ।
अषाड माह में शुक्लपक्ष की पूनम का दिन गुरु पुर्णिमा का दिन है। गुरु का अर्थ समझें तो गुरु शब्द में (गु) का मतलब है अंधेरा, अज्ञानता और (रु) का मतलब है दूर करना। यानि जो हमारी अज्ञानता दूर करता है एवं जीवन में निराशा एवं अंधकार को दूर करे, वह गुरुदेव हैं।
हमारी संस्कृति एक अति महत्वपूर्ण पहलू गुरु-शिष्य परंपरा है। जिस समय बच्चों को पवित्र धागा पहना कर आश्रम भेजा जाता है, तब से ही उनकी जिंदगी बनाने का कार्य गुरु करते हैं। उसके लिए माता-पिता दोनो गुरु ही हैं, और जब वह अपना विद्याभ्यास खत्म करके जिंदगी की नयी शुरूआत करता है, तब आश्रम से अलविदा लेने से पहले शिष्य गुरु को अपनी शक्ति अनुसार गुरुदक्षिणा देते हैं। यह परंपरा जारी रख कर, हर साल गुरु पुर्णिमा के दिन गुरु का ऋण पूरा करने के लिए अपनी क्षमता के अनुसार हर व्यक्ति अपने गुरु को कुछ उपहार के तौर पर कुछ देता है, इसे गुरु-शिष्य परंपरा कहा जाता है।
अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु वह है जो अज्ञान का निराकरण करता है अथवा गुरु वह है जो धर्म का मार्ग दिखाता है। श्री सद्गुरु आत्म-ज्योति पर पड़े हुए विधान को हटा देता है।
‘सदगुरु जिसे मिल जाय सो ही धन्य है जन मन्य है।
सुरसिद्ध उसको पूजते ता सम न कोऊ अन्य है॥
अधिकारी हो गुरुदेव से उपदेश जो नर पाय है।
भोला तरे संसार से नहीं गर्भ में फिर आय है॥’
पण्डित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के अवतार वेद व्यासजी का जन्म हुआ था। इन्होंने महाभारत आदि कई महान ग्रंथों की रचना की। कौरव, पाण्डव आदि सभी इन्हें गुरु मानते थे इसलिए आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा व व्यास पूर्णिमा कहा जाता है। गुरु का दर्जा भगवान के बराबर माना जाता है क्योंकि गुरु, व्यक्ति और सर्वशक्तिमान के बीच एक कड़ी का काम करता है. संस्कृत के शब्द गु का अर्थ है अन्धकार, रु का अर्थ है उस अंधकार को मिटाने वाला ||
भारतीय अध्यात्म में गुरु का अत्ंयंत महत्व है। सच बात तो यह है कि आदमी कितने भी अध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ ले जब तक उसे गुरु का सानिध्य या नाम के अभाव में  ज्ञान कभी नहीं मिलेगा वह कभी इस संसार का रहस्य समझ नहीं पायेगा। इसके लिये यह भी शर्त है कि गुरु को त्यागी और निष्कामी होना चाहिये।  दूसरी बात यह कि गुरु भले ही कोई आश्रम वगैरह न चलाता हो पर अगर उसके पास ज्ञान है तो वही अपने शिष्य की सहायता कर सकता है।  यह जरूरी नही है कि गुरु सन्यासी हो, अगर वह गृहस्थ भी हो तो उसमें अपने  त्याग का भाव होना चाहिये।  त्याग का अर्थ संसार का त्याग नहीं बल्कि अपने स्वाभाविक तथा नित्य कर्मों में लिप्त रहते हुए विषयों में आसक्ति रहित होने से है।
पण्डित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार आत्मबल को जगाने का काम गुरु ही करता है. गुरु अपने आत्मबल द्वारा शिष्य में ऐसी प्रेरणाएं भरता है, जिससे कि वह अच्छे मार्ग पर चल सके. साधना मार्ग के अवरोधों एवं विघ्नों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान है. गुरु शिष्य को अंत: शक्ति से ही परिचित नहीं कराता, बल्कि उसे जागृत एवं विकसित करने के हर संभव उपाय भी बताता है ||पण्डित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस दिन गुरु की पूजा कर सम्मान करने की परंपरा प्रचलित है। हिंदू धर्म में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि गुरु ही अपने शिष्यों को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है तथा जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार करता है ||
Zomato guru purnima 2019 जानिए वर्ष 2019 में गुरुपूर्णिमा का महत्व, उपाय आदि… o2 badge r

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