fbpx

जानिए मुंबई में देवेंद्र फडणवीस सरकार बनने की कथा, कैसे तैयार हुई स्क्रिप्ट

जानिए मुंबई में देवेंद्र फडणवीस सरकार बनने की कथा, कैसे तैयार हुई स्क्रिप्ट  जानिए मुंबई में देवेंद्र फडणवीस सरकार बनने की कथा, कैसे तैयार हुई स्क्रिप्ट know the story of the formation of devendra fadnavis government in mumbai how the script was prepared

तंत्र, मंत्र, षडयंत्र, नीति, रीति, दर्शन, समाज और इससे इतर परालौकिक ज्ञान के सभी सिद्धांत मिलकर राजनीति का निर्माण करते हैं। इसका व्यवहार में प्रयोग करके सफल होने वाला चाणक्य कहलाता है। महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस सरकार के 23 नवंबर के घटनाक्रम में एक बार फिर चाणक्य की नई परिभाषा गढ़ दी है।

भाजपा के सांसद संजय कक्कड़ से लेकर महाराष्ट्र के 1-2 उद्योगपति भी इस कॉमिक्स को ढंग से समझने में लगे हैं। केंद्र सरकार के एक केंद्रीय मंत्री को अभी भी बाजी पलटने की संभावना दिखाई दे रही है। उच्चतम न्यायालय तक मामला पहुंचने के बाद भी जहां भाजपा सफलता का फार्मूला अपनाने में जुटी है, वहीं कांग्रेस और शिवसेना के रणनीतिकार फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं। दिलचस्प है कि इस राजनीति की पूरा ड्रामा एनसीपी नेता शरद पवार के इर्द गिर्द ही घूम रही है।

खास बातें

यूं ही नहीं चले गए अजीत पवार…पल पल से अपडेट थी भाजपा : 

राजनीतिक गलियारे में आधी हकीकत, आधा फसाना चलता है। कुछ दिखाई देता है, कुछ सुनाई देता है और कुछ पर्दे के पीछे चलता रहता है। कुछ का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अकारण राज्यसभा में एनसीपी की वेल मे आकर हंगामा न करने के निर्णय तारीफ यूं ही नहीं की थी। कह सकते हैं कि यह गॉसिप है, लेकिन मुंबई में कुछ डेवलपमेंट चल रहा था। प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, रोहित पवार, सुप्रिया सुले और अजित पवार तक को बहुत कुछ भनक लग रही थी। अजित पवार तमाम लोगों के संपर्क में थे। यह भी सही है कि एनसीपी से सारे अधिकार छीने जाने के 12 घंटे पहले तक वह महाराष्ट्र में चाचा शरद पवार के सबसे करीबी सिपहसालार थे।

कहा यह भी जा रहा है कि जिन लोगों के पास शरद पवार से संपर्क करने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने दिल्ली में भाजपा के नेताओं को कुछ अहम संकेत दिए थे। भाजपा के महासचिव भूपेन्द्र यादव, केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी की भी महाराष्ट्र में हर घटनाक्रम पर नजर थी। इतना ही नहीं शिवसेना को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किए जाने वाले दिन से कांग्रेस ने दूध ही नहीं छाछ भी फूंक-फूंककर पीना शुरू कर दिया था। इधर प्रधानमंत्री की तारीफ ने उसी छाछ में जीरे का तड़का लगा दिया था।

प्रधानमंत्री से शरद पवार के मिलने से पहले की पटकथा

शिवसेना और कांग्रेस को कई बार कुछ समझ में नहीं आया क्योंकि कांग्रेस और शिवसेना दोनों के रणनीतिकार शरद पवार से उम्मीद कर रहे थे। मगर खुलकर और सीना ठोंककर भरोसा नहीं कर पा रहे थे। शरद पवार के पास कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की सहमति का वीटो था, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष भी पवार को और पार्टी के हित को भलीभांति समझकर आगे बढ़ रही थी।
शिवसेना उम्मीद कर रही थी कि उसके पास शाम तक समर्थन की चिट्ठी आएगी। अचानक सूचना मिली चिट्ठी कांग्रेस, एनसीपी से कुछ मुद्दों पर सहमति और न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनने के बाद आएगी। तब तक शिवसेना अपने केंद्रीय मंत्री अरविंद सावंत के इस्तीफे की घोषणा करा चुकी थी और राज्यसभा सांसद संजय राउत कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना की सरकार बनने का दावा कर चुके थे।
कांग्रेस अध्यक्ष पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक कर रही थीं। अचानक शरद पवार से टेलीफोन पर हुई बातचीत के बाद वह संभलकर चलने लगीं। एक खबर मीडिया में भी आई कि कांग्रेस देरी कर रही है। उधर संजय राउत सीने में दर्द की शिकायत लेकर मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती हो चुके थे। तब तक राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी एनसीपी को समर्थन देने के लिए आमंत्रित कर चुके थे। शरद पवार स्थिति की गंभीरता को समझकर संजय राउत को अस्पताल देख आए। उद्धव ठाकरे ने भी प्रतिष्ठा पर आंच देखकर मातोश्री से निकलना उचित समझा।
अगले ही दिन एनसीपी ने दिन में 11 बजते-बजते राज्यपाल से और समय की मांग की। दोपहर होते-होते महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लग गया। यह पटकथा पढ़ने के लिए शिवसेना और कांग्रेस के नेताओं की छटपटाहट काफी बढ़ गई।

पवार ने सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा

एनसीपी के प्रवक्ता नवाब मलिक या फिर कांग्रेस के नेता स्थिति संभाल रहे थे। घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ रहा था। 19 नवंबर (मंगलवार) तक संजय राउत, शिव सेना को छोड़कर दोनों अन्य दल सरकार बनने के दावा करने से बच रहे थे। बताते हैं तब तक एक अजीब सी आशंका पर्दे के पीछे अपना आकार ले रही थी। 18 नवंबर को पीएम मोदी ने एनसीपी और बीजद(यू) की तारीफ की। 19 नवंबर को राउत ने बताया कि शरद पवार जल्द ही पीएम मोदी से महाराष्ट्र के किसानों का मुद्दा लेकर मिल सकते हैं। कांग्रेस पार्टी के नेता अहमद पटेल समेत अन्य को पवार साहब के प्रधानमंत्री से मिलने की टाइमिंग समझ में कम आ रही थी। राउत भाजपा के नेताओं पर तंज कस रहे थे कि उन्हें पवार साहब को समझने के लिए 100 जन्म लेने पड़ेंगे, लेकिन उनके चेहरे पर तनाव दिख रहा था।
तब तक किसी भी मंच से शरद पवार में कांग्रेस, एनसीपी के सहयोग से शिवसेना के नेतृत्व वाली सरकार बनने को लेकर कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया था। यहां तक कि सोनिया गांधी से मिलने के बाद मीडिया में शरद पवार ने केवल यह कहा कि महाराष्ट्र के ताजा राजनीतिक घटनाक्रम पर बात हुई, लेकिन सरकार बनाने पर कोई चर्चा नहीं हुई। राजनीति के जानकार इसे शरद पवार की सुरक्षित साइड लेकर चलने की रणनीति से जोड़ रहे थे। शिवसेना सरकार बनने की नई डेटलाइन लगातार दे रही थी। भाजपा के नेता भी उनकी इस चाल को देखकर उम्मीद बनाए थे। इस उम्मीद को प्रधानमंत्री से शरद पवार की हुई मुलाकात ने और बल दे दिया।

शरद पवार प्रधानमंत्री से मिलकर बाहर निकले

प्रधानमंत्री मोदी शरद पवार से मिलकर आने के बाद संसद भवन में लोकसभा की लॉबी में पवार ने चुनिंदा पत्रकारों से बात की। उनमें मैं भी था। शरद पवार ने अपनी मुलाकात को किसानों के मुद्दे पर केंद्रित भर बताया और कहा कि उन्होंने किसानों के मुद्दे पर सम्मेलन के लिए 31 जनवरी को प्रधानमंत्री को आमंत्रित किया है। पवार कुछ नहीं बोले।
लोकसभा के गलियारे की तरफ बढ़ गए। लोगों को समझ में नहीं आया कि क्या 50 मिनट तक की बातचीत का विषय सिर्फ यही था। वह भी इस समय। जब महाराष्ट्र में सरकार बनने की कसरत चल रही है। शाम होते-होते एक महाराष्ट्र के मिलनसार केंद्रीय मंत्री के हवाले एक कानाफूसी आई।
इस कानाफूसी में कहा गया कि शरद पवार ने उनसे कहा कि प्रधानमंत्री खुलकर कुछ नहीं बोले। अगर खुलकर बोलते तो दो मिनट में महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बन सकती थी। यह कानाफूसी राजनीतिक गलिायारे में तेजी से फैली। इस मुलाकात शिवसेना और कांग्रेस के नेताओं को भी हैरान किया और शाम होते-होते शरद पवार के घर पर राजनीतिक जमघट लगने लगी। यहां (बुधवार, 20 नवंबर) से राजनीति के पर्दे पर खुलकर सामने आने लगा कि महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी, कांग्रेस की सरकार जल्द बनने वाली है।

मुंबई में तेजी से चला घटना क्रम

दिल्ली के नेताओं को बातचीत का नया ठिकाना मुंबई ठीक लगा। कारण वहां शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे थे। कांग्रेस के नेता भी मुंबई पहुंच गए। तब तक कांग्रेस के नेताओं ने शिवसेना को समर्थन देने, सरकार में शामिल होने को लेकर पूरी माथा मच्ची कर ली थी। पंजाब, तमिलनाडु और अन्य सहयोगियों की सलाह का पर विमर्श कर लिया था।
22 तारीख को शाम सात बजते-बजते शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की महाराष्ट्र में सरकार बनने की तस्वीर साफ होने लगी। राउत के मुताबिक इस बैठक में एनसीपी नेताओं के साथ अजीत पवार थे। अजित पवार के पास पार्टी प्रमुख शरद पवार के निर्देश पर सभी 54 विधायकों का समर्थन देने के लिए हस्ताक्षर वाला पत्र था। अजित पवार को एनसीपी विधायक दल का नेता चुन चुकी थी। पार्टी के दो नेता प्रफुल्ल पटेल और अजित पवार पर जांच एजेंसियों का दबाव भी इस पूरी कॉमिक्स के पीछे एक बड़े कारण के तौर पर देखा जा रहा है।

शाम से रात भर में बदल गई पटकथा

22 नवंबर की शाम को एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने पहली बार दो घोषणाएं की। पहली उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनने के लिए मान गए हैं। दूसरी घोषणा शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की सरकार जल्द बनने की थी। पवार के मुंह से यह घोषणा इसलिए अहम मानी गई, क्योंकि वह अभी तक जहां इससे बच रहे थे, वहीं उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता पर ही संदेह भी साथ में यात्रा कर रहा था।
पवार ने यह घोषणा उद्धव ठाकरे, अहमद पटेल समेत तीनों दलों के वरिष्ठ नेताओं के साथ हुई बैठक के बाद की थी। इस बैठक में अजित पवार भी थे। बैठक में तय हुआ था कि 23 नवंबर को फिर तीनों दलों के नेताओं की बैठक होगी और 12.30 बजे (पवार के अनुसार) राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया जाएगा।
अगले दिन के अखबारों में पवार को प्रमुखता देते हुए तीनों दलों और भाजपा नेताओं के बयान के साथ इसे लीड बनाया। यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि एक दिन पहले तक और बीच में कभी कभी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भाजपा के अध्यक्ष चंद्रकांत पाटील भी राज्य में भाजपा की सरकार बनने का दावा करते रहे।

…अरे अजीत पवार डिप्टी सीएम की शपथ ले रहे हैं

सुबह पौ फटते ही हर आदमी अखबार में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की सरकार, उद्धव ठाकरे के भावी मुख्यमंत्री बनने की खबर पढ़ रहा था और उधर महाराष्ट्र का राजभवन नया इतिहास लिखने की तैयारी कर रहा था। 23 नवंबर को सुबह 5.47 बजे राष्ट्रपति शासन हटा और 7.30 बजे राजपथ में फडणवीस मुख्यमंत्री और अजित पवार उपमुख्यमंत्री ने शपथ ले ली। सब चौके। कांग्रेस के नेता भी, 29 अक्तूबर से नई संभावना में जुटी शिवसेना भी। उद्धव ठाकरे भी और संजय राउत भी।
कांग्रेस के कुछ नेताओं को साफ लगा कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने राजनीति का खेल रच दिया। इसी आशंका ने शिवसेना को घेर लिया। भाजपा के नेताओं को शरद पवार की राजनीतिक विश्वसनीयता पर भ्रम फैलाने का पुख्ता अवसर मिल गया क्योंकि अभी तक सबसे बड़ा सस्पेंस भी शरद पवार ही बनाकर चल रहे थे। कांग्रेस के नेता की माने तो उद्धव ठाकरे का फोन कांग्रेस के नेताओं के पास भी आया।
संजय राउत और उद्धव ठाकरे ने भी पवार से बात की। अंत में तय हुआ कि 11.30 बजे संयुक्त प्रेस वार्ता में शरद पवार एनसीपी का पक्ष रखेंगे। तब तक सांसद और पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने पिता की राजनीतिक विश्वसनीयता को देखकर परिवार और पार्टी दोनों के टूटने का संदेश देना शुरू कर दिया। मीडिया ने भी चाचा (शरद पवार) और भतीजे अजित पवार पर अपना फोकस बढ़ा दिया। उद्धव ठाकरे ने शिवसेना की प्रतिष्ठा को देखकर शरद पवार के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता को संबोधित किया। कांग्रेस पार्टी ने सुरक्षित लाइन लेना मुनासिब समझा और अहमद पटेल, केसी वेणुगोपाल, पृथ्वीराज चव्हाण, सुशील कुमार शिंदे, मल्लिकार्जुन खड़गे थोड़ी देर बाद अलग से प्रेस के सामने आए। लेकिन सभी ने एकजुटता ही दिखाई।

रात भर जागती रही मुंबई और दिल्ली

दिल्ली की रायसीना की पहाड़ी तिलिस्म से भरी सत्ता के तमाम तरंगों की गवाह है। मुंबई के बारे में कहा जाता है न दिन को सोती है और रात को। 22-23 नवंबर कि रात को दोनों ने एक साथ जागने का मन बनाया। बताते हैं डिप्टी सीएम अजित पवार लगातार भाजपा के कुछ नेताओं के संपर्क में थे। अजित पवार को भी चाचा शरद पवार की राजनीतिक गहराई का पूरा अंदाजा था।
संजय राउत कहते हैं कि 22 नवंबर को शाम को बैठक में अजित पवार को आंख से आंख मिलाने में दिक्कत हो रही थी। वह कुछ छिपा रहे थे। अचानक कुछ समय के लिए फोन पर सक्रिय रहते हुए वह लोगों के बीच में गायब हुए और कहीं चले गए। समझा जा रहा है कि अजित पवार 23 नवंबर को महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन की भाजपा के नेताओं को सूचना देने गए थे।
अजित पवार के पास पार्टी के 54 विधायकों के हस्ताक्षर वाला पत्र था। इस सूचना के बाद महाराष्ट्र का राजभवन और कुछ समय के भीतर ही रायसीना पहाड़ी स्थित सत्ता का गलियारा सक्रिय हुआ। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने अपनी सुविधानुसार स्थितियों का आकलन करने के बाद राष्ट्रपति शासन हटाने की अनुशंसा की। आमतौर पर ऐसी अनुशंसा के बाद प्रधानमंत्री के अध्यक्षता वाला केंद्रीय मंत्रिमंडल इस पर निर्णय करके राष्ट्रपति के पास अनुमोदन के लिए भेजता है।

COMMENTS

WORDPRESS: 0