बीकानेरराजस्थान

सोनाली सुथार की पहली काव्य कृति ‘सुध सोधूं जग आंगणै’ लोकार्पित

बीकानेर। युवा कवयित्री सोनाली सुथार की गायत्री प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पहली राजस्थानी कृति ‘सुध सोधूं जग आंगणै’ का लोकार्पण सोमवार को स्थानीय धरणीधर रंगमंच पर हुआ। पारायण सस्थान द्वारा साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के संयोजक डॉ.अर्जुनदेव चारण के सानिध्य में आयोजित इस समारोह की मुख्य अतिथि  स्त्री विमर्श की चर्चित लेखिका ममता कालिया थीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ रंगकर्मी, पत्रकार व साहित्यकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ थे। सोनाली ने अपनी पहली कृति अपने दादा सुगनाराम कुलरिया और मदनगोपाल आसदेव को समर्पित की।

डॉ.अर्जुनदेव चारण ने इस अवसर पर कहा कि सोनाली की कविताएं आधुनिक राजस्थानी की ऐसी रचनाएं हैं, जिन्हें पढ़ते हुए कहा जा सकता है कि समकालीन भारतीय भाषा की दूसरी कविताओं से राजस्थानी कविताएं कहीं पीछे नहीं है। इन कविताओं में जो नयापन है, वह राजस्थानी कविता को नया मुहावरा देगा। आज के दौर में जब युवा दूसरी भाषा में लिखकर उसी में अभिव्यक्त होने लगते हैं, ऐसे समय में सोनाली ने अभिव्यक्ति के लिए अपनी मायड़ भाषा का चयन करके अपना कत्र्तव्य निभाया है।
ममता कालिया ने इस अवसर पर कहा कि यह कविताएं स्वयं को खोजने की प्रक्रिया से निकलते रचनाकार की यात्रा है। इन कविताओं में जो स्वर उभरता है, वह निराशा का नहीं बल्कि अपने मौलिक सवालों का है। यह कविताएं कौतुहल और जिज्ञासाओं से परे अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने कहा कि ‘सुध सोधूं जग आंगणै’ की कविताएं आधुनिक राजस्थानी की प्रतिनिधि कविताएं हैं। सोनाली ने कविताओं को लिखा नहीं बल्कि बुना है। कविता संग्रह से निकलते हुए लगता है जैसे सोनाली की रचना प्रक्रिया महीन है, वह अपने विचारों को छानते हुए आगे बढ़ती है।
वास्तुविद आर.के.सुतार ने इस अवसर पर कहा कि कवि के रूप में ईश्वर अपने स्वरूप के रूप में इस धरती पर विद्यमान है। ईश्वर का दूसरा स्वरूप मां है। सोनाली बचपन से ही लिखती-पढ़ती रही हैं, ये कविताएं उसकी अनुभव यात्रा का ही प्रस्फुटन है। अभी इसे लंबा सफर तय करना है।
प्रारंभ में स्वागत भाषण वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्र आचार्य ने दिया। पत्रवाचन राजस्थानी के युवा कवि पुरस्कार से समादृत आशीष पुरोहित ने किया। संचालन कवयित्री-कथाकार ऋतु शर्मा ने किया। आभार साहित्यकार-पत्रकार हरीश बी.शर्मा ने स्वीकारा।

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