परंपरा अतीत का नवनीत

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बीकानेर ,साहित्य परंपरा अतीत का नवनीत होती है,उसमें देश , काल और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन होते हैं भारत की साहित्य धारा दस हजार साल से अनवरत बह रही है। शब्द व्युत्पत्ति के शास्त्र केवल भारत में ही उपलब्ध होते हैं।यह विचार साहित्य परिषद् की संगोष्ठी में मुख्य वक्ता चुरु के साहित्यकार   डा सुरेन्द्र डी सोनी ने व्यक्त किये।डा मूल चंद बोहरा ने कहा कि श्रेष्ठ साहित्य व्यंजना प्रधान होता है। डा अखिलानंद पाठक ने कहा कि भारतीय परंपरा में लोक की विशेष भूमिका है।श्रीमती सुधा ने राजस्थानी लोक गीत परंपरा पर प्रकाश डाला।डा रजनीरमण झा ने कहा कि भारतीय साहित्य राष्ट्रीय सीमाओं से बढकर विश्व कल्याण की बात करता है ।राजाराम स्वर्णकार ने कविता के माध्यम से साहित्यिक एकात्मता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम अध्यक्ष डा उज्ज्वल गोस्वामी ने संस्कृत साहित्य को भारत की श्रृंगार, नीति, वीरत्व धाराओं का उत्स बताते हुए कहा कि वर्तमान कथा साहित्य एवं नाटकों में प्रयुक्त संवाद शैली का प्रथम प्रयोग वेदों में संवाद सूक्त के रूप में मिलता है।उन्होंने कहा कि साहित्यिक वाद औपनिवेशिक ताकतों के हथियार हैं।कवयित्री सुश्री नीलम पारीक ने “मां’   और “चांद “शीर्षक कविताएं सुनाई ।कर्णसिंह बेनीवाल ने सभी श्रोताओं का आभार प्रकट किया। मंच संचालन कवि विनोद कुमार ओझा ने किया।

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