वॉट एन आईडिया- व्यंग्य by Sanjay Purohit

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जैसे सावन में मेघ उमड़-घुमड़ कर आते हैं। वैसे ही त्यौहारी सीज़न में फाईनेंस कम्पनियों के विज्ञापन टीवी, रेडियो, अख़बारों में छा जाते हैं। आम आदमी का त्यौहारी सीजन बिना गंजे हुए पार होना ‘नॉट पोसिबल’ है। मिडिलमैन को मुंह चिढ़ाते प्रॉडक्ट्स और उनके साथ अटैच हुए फाईनेंस कम्पनियों के ललचाते विज्ञापन। ये दोनों मिलकर आम आदमी को मंहगाई के घाट पर धोबी पछाड़ देकर पटकने के लिए काफी है। आम आदमी तो फिर भी जैसे-तैसे इनसे बच-बचा कर निकल जाये, पर आम आदमी की औरत, आम आदमी के बच्चे ऐसा होने नहीं देते। उनकी डिमाण्ड ‘न्यू- इन्डिया’ के फेवर में है। ‘न्यू इन्डिया’ के स्टेटस को मैन्टैन करने के लिये न्यू प्रॉडक्ट्स चाहिये ही चाहिये। ख़ैर।
बात मस्त सुबह की। एक आवाज़ सुनाई दी। ‘लोन ले लो, लोन !’ पहले तो लगा कि भरम है। कबाड़ी वाला होगा। पण दिमाग ठनका। कबाड़ी की परम्परागत आवाज़ तो ये होनी चाहिये थी कि -‘टूटा भंगार लोह पुराणा, पिलास्टिक की चप्पल-बाल्टी’ या फिर- ‘फटी-पुराणी धोतियों में चीनी वाले बरतन’ बट ये डिफरेंट साउण्ड था। आवाज़ दोबारा आई- ‘लोन ले लो..लोन!’ मैंने खिड़की से बाहर झांका। मुंह ने स्वत: संज्ञान लेकर उचारा। ”हे राम ! हे राम ! ! हे राम ! ! ! लोन देने वाले वास्तव में गाडा लेकर आए थे। गाडा यू नो ? गाडा यानि रेहड़ी। फाईनेंस कंपनियों ने आम आदमी को ऋणी बनाने के लिए नया चारा डाला था। गाडे ! हाईटेक गाडे।
मोहल्लों से कॉलोनियों, सर्किलों से गलियों तक सुब

ह-सवेरे आए इस लोन देने वाले हाईटेक गाडे की ही चर्चा। कुछ लोग लाल गमछिया पहने, लाल मंजन से, लाल दांतों को चमकाने की क्रियारत रहते हुए इन गाडों को निहार रहे थे। उनके निहारने से यह लग रहा था कि जैसे दशहरे पर संचेतन झांकियों के दर्शन कर रहे हों। मैंने अपना माईनस सवा दो नम्बर का चश्मा बचायी हुई नाक पर टिकाया। वॉट ए गाडा ! दायें-बायें से लेकर उपर-नीचे। घर-लोन, कार-लोन, मोबाईल-लोन, बाईक-लोन, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, अलमारी, मोबाईल लोन, ये लोन वो लोन। भांत-भांत के आईटमों के लिए भांत-भांत के लोन के फलेक्स। गाडे पर टंगे लोन की स्कीमों के पोस्टर्स, ब्रोशर्स। सन्नी लियोनी का लोनी बनने का ललचाना, लवसिक्त ऑफर ! कपड़ों से साहेबा को वैसे ही परहेज़ रहा है पर इसमें भी जीएसटी की कटौती के बाद….हाय !!

 

गाडे के साथ आये सेल्समैन घर-घर जाकर कुण्डी खड़का रहे थे। घंटी बजा रहे थे। स्कीमें समझा रहे थे। मेरे घर की घंटी बजी। ये घंटी खतरे की थी। ये पूर्वानुमान था ही। मैं कदाचित कॉलोनी का मोस्ट रेस्पेक्टेड परसन था। इसीलिये मेरे यहां सेल्समेन नहीं बल्कि खुद गाडा मैनेज़र आये थे। मैंने दरवाजा खोला। भयभीत होकर उसे देखा। वे अन्दर घुसते हुए बोला, ”तो सर ! इस फेस्टिव सीजन में भाभीजी, बच्चों को क्या गिफट देकर सरप्राईज करेंगे ? एचडी एलईडी टीवी या फिर फुल्ली ऑटोमेटिक वॉशिंग मशीन ? ए डायमंड नेकलेस या फिर, एक चमचाती डायमंड रिंग ?”
मैं झटके से उसके मुंह पर अंगुली रख कर बोला, ”अरे नासपीटे। हमरी दाल-रोटी के बैरी, महंगाई की धोबी-पछाड़ से वैसे ही हमारा कादा निकल रहा है। हम चारों खाने चित्त है। अब अधमरे के साथ भी डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. खेलोगे ?”
गाडा मैनेजर ने मेरी बात को अनसुना किया। यू नो, ही वॉज़ ट्रूली प्रोफेशनल ! मेरी अंगुली अपने मुंह से हटाते हुए बड़े ही प्रोफेशनल अंदाज़ में रटे-रटाये तोते की तरह बोलना शुरू कर दिया, ”सर आप कोई भी आईटम खरीदें, चाहे आपके पास पैसे हो या नहीं हो, डोंट वरी। वी आर हियर टू हैल्प यू। प्रॉडक्ट चूज़ कीजिये। फाईनेंस हम करेंगे। हण्डरेड परशेंट फाईनेंस। इन्टरेस्ट रेट ऑनली टेन परशेंट। न्यू इण्डिया का स्टार्टअप।”
उसका अंदाज़ कुछ ऐसा था जैसे हाईवे के ढाबे पर बैयरा सब्जियों की डिटेल देता है। मैं उसको फटी आंखों से धीरे बोलने के लिये रिक्वेस्टरत था पर वह बोलता ही जा रहा था, ”यू नो सर! आपको कुछ फोरमेलिटीज़ कम्पलीट करनी होगी। देट’स इट। तो सर फेस्टिवल पर मनाईये खुशियां – नये प्रॉडक्ट्स के साथ।
मैंने भी हाथों हाथ बदला लिया। उसकी बात को कान नहीं धरा। बल्कि काउन्टर अटैक करते हुए टॉपिक ही चेंज़ कर डाला। मैंने कहा, ”मैनेज़र साब, वॉट एन आईडिया! बट ये गाडे वाला आईडिया आया कहां से ?” मैनेजर ने मुझे देखा। स्माईल फेंकी। बोला, ”सर, दीवाली के समय हर घर में सफाई होती है। कबाड़ी आता है। कबाड़ ले जाता है। बस इसी पोईंट को हमने पकड़ा। यू नो। ट्रेडिशनल-वे ऑलवेज गेट्स सक्सेस। पुराना कबाड़ जायेगा तो नया कबाड.. आई मीन, नया आईटम भी तो आना चाहिये ना।”
मैंने फीकी मुस्कान के साथ आहिस्ते से कहा, ”अबे स्टार्टअप के मस्कट। पहले तो ऑफिसो में ही आते थे। अब घरों में भी ?” उसने तत्क्षण ही रिप्लाया, ”यू आर राईट। पहले ऑफिसों में जाते थे। वहां हमें टरका दिया जाता था। अब हमने घर पहुंचकर बीबी-बच्चों के सामने ही कॉमनमैन को घेरने की, आई मीन रिक्वेस्ट करने का डिसिज़न लिया है। बीबी-बच्चों के सामने किस्तों पर आईटम के ऑफर का ठुकराना इज वैरी डिफिकल्ट, यू नो।” उसकी स्माईल में कुटिलता मय दुष्टता का पुट था।
तभी बेडरूम का दरवाजा आहिस्ते से खुला। ‘चररर्ररर’ मैंने कनखियों से देखा। डिस्कवरी चैनल में जैसे शेरनी हिरण के लिये घात लगाती हुई आहिस्ते से आकर दबोच लेती है, ठीक वैसे ही, ऑन दी फलोर मेरी रीलीजीयस वाईफ का आगमन हो चुका था।
उसे देखते ही गाडा मैनेजर स्माईलते हुए बोला, ‘वेलकम भाभी जी। देखिये हम आप जैसी खूबसूरत गॉरजस वूमेन के लिये कितने लेटेस्ट प्रॉडक्टस और अप्लाईन्सेज लेकर हाज़िर हुए हैं। आफटरऑल यू डिजर्व द बेस्ट।” वाईफ तत्काल ही हिरोईन की तरह एटीटयुड बिखेरते हुए बोली, ”यस…ये आपने बहुत अच्छा डिसिज़न लिया। घर पर प्रॉडक्ट के बारे में डिटेल डिस्कस हो जाती है। मुझे और बच्चों को काफी शॉपिंग करनी भी थी। आप मुझे दिखाईये…..।”
गाडा मैनेजर का आईडिया सफल रहा था। शेरनी के पंजों में हिरण दबोचा जा चुका था। मैं तो क्या, अब तक तो आप भी समझ चुके होंगे कि शेष वृतांत क्या रहा होगा।
स्टार्टअप के आईडिये वाले गाडा मैनेजर विजयी मुस्कान के साथ मेरे घर से बाहर निकल रहा था। जाते हुए पलट के बोला, ”एन आईडिया कैन चेंज योर लाईफ।”

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